आत्मनिर्भर भारत का
स्वप्न और एकात्म मानवदर्शन
हरिशंकर सिंह कंसाना
संक्षिप्त रूप
भारतभूमि
के मूल सांस्कृतिक दर्शन ‘एकात्म मानवदर्शन्’की पहचान यह है कि वह व्यक्ति को अपनी
माटी से प्रेम करना तो सिखाता ही है साथ ही आत्मनिर्भरता रूपी ‘स्वत्व की सीख’ भी देता
है। जैसे जैसे हमारे संसाधनो की कमी का ध्यान हमें आता है वैसे वैसे सभी भारतीय नौजवानों
को उनकी क्षमता व बुद्धिमता के अनुकूल रोजगार मुहैया कराने का चिंतन भी स्वाभाविक हो
जाता है। एकात्मता का भारतीय चिंतन हमारे दृष्टिकोण को संतुलित, श्रमशील, उधमी, नवाचारी
बनाए रखता है। क्योकि इसमें न तो भोगवाद को महत्व है और न ही व्यक्तिवाद की संकुचित
मानसिकता के लिए स्थान। यह चिंतन स्वावलंबी, कौशलसम्पन्न, सामूहिकता, प्रकृति से तादात्म्य,
नैतिकतापरक बनाने के साथ ही दीर्धकालीन जीवनचर्या को भूलने नही देता। निश्चित ही हमारे
युवाओं का ध्येय ऐसा होगा तो वे ‘आत्मनिर्भर’ तो बनेंगे ही और अपने श्रम से स्वत्व
को भी बचाए रखेंगे। यह तय करना है कि आज के नवीन युग में हम एकात्म मानवदर्शन की राह
पर चलकर कितना आत्मनिभर बनते हैं? देखें तो भारत सरकार की नवीनतम योजना ‘आत्मनिर्भर
योजना’ को बेहतर ढंग से क्रियान्वयन किया जाए
तो बेहतर परिणाम मिलेंगे और इसे हम मजबूत आर्थिक रणनीति का हिस्सा भी बना सकेंगे।
कुंजीशब्दः
आत्मनिर्भरता, मूल दर्शन, सामंजस्य, समन्वयवाद, सक्षम भारत, स्वत्व की सीख, राष्ट्रजीवन
की धारा इत्यादि।
उद्देश्य
भारतबर्ष
के मूल दर्शन एकात्म मानवदर्शन के चिंतन पर चलकर बहुत अच्छे से आर्थिक सामाजिक क्षेत्र
की योजनाओं को सफलता पूर्वक क्रियान्वित करवाया जा सकता है। समृद्ध भारत का स्वप्न
साकार करने में सफल होने के लिए ठोस आर्थिक रणनीति की आवश्यकता तो है ही किंतु उससे
कहीं अधिक आवश्यकता है सही दिशा और दृष्टि की। एकात्म मानवदर्शन और आत्मनिर्भर भारत
के स्वप्न मे इस दृष्टि से गहरा जुड़ाव है और इस दृष्टि से भारत के मूल दर्शन को ध्यान
में रखकर विकास किया तो प्रगति दीर्धकालिक रह पाएगी। इसी जुड़ाव के गहरे अध्ययन की आवश्यकता
है ताकि ठोस आर्थिक विकास के परिणामस्वरूप भारत को हर क्षेत्र मे आत्मनिर्भरता प्रदान
हो सके।
अवधारणा
कोरोना
महामारी के त्रासद काल में यह बहुत स्पष्ट हो गया है कि इस महामारी के पहले और बाद
के वैश्विक परिदृश्य में समानता नहीं होगी क्योकि हर स्तर पर बहुत कुछ परिवर्तित हो
चुका होगा। बदलाव की इस स्थिति को भापते हुए देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री महोदय जी
द्वारा 12 मई 2020 को राष्ट्र के लिए एक विजन की घोषणा की और वह था ‘आत्मनिर्भर भारत
का विजन’। 21वीं शताब्दी के भारत के ‘समृद्ध भारत एवं सशक्त भारत’ के स्वप्न को साकार
करने के लिए ‘आत्मनिर्भर भारत’ के स्वप्न को पूर्ण करना पहली शर्त है और यह कोई दुष्कर
कार्य नहीं है। कि यह हमारे सामर्थ में न हो क्योकि भारत के पास जितना विशाल घरेलू
बाजार और माँग है, विश्व मे अन्यत्र नहीं। हमें आवश्यकता हंै तो केवल अपने उपलब्ध संसाधनों
की पूरी क्षमता के साथ सदुपयोग करने की। ऐसी उधमशीलता की शक्ति और गहरे आत्मविश्वास
की प्रेरणा तो हमें हमारा मूल दर्शन एकात्म चिंतन ही दे सकता है। यह दर्शन इसलिए सफल
और सार्थक है क्योकि यह सिखाता है कि आत्मनिर्भर बनने के लिए अपने कार्यों को ठीक ढंग
से करने का श्रम तो करो ही बल्कि आपकी आत्मनिर्भरता का ध्येय भी सर्वहितकारी हो। यह
व्यक्ति की वैयक्तिक भोगवादी प्रवृत्ति पर नहीं बल्कि ‘सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय’
के मूल मंत्र पर टिका है। ऐसी आत्मनिर्भरता अहंकार निर्मित नही होने देती न ही दूसरों
से वेवजह तुलना कर अस्वीकार की स्थिति उत्पन्न करती है अपितु यह तो स्वयं के आत्मसम्मान
के साथ-साथ दूसरों के अस्तित्व की भी रक्षा करती हैं। यह स्वयं को साबित करने मात्र
का विचार नही अपितु दूसरों के लिए सहायता का हाथ बढ़ा लेने का अवसर भी देती है।
राष्ट्रजीवन
की धारा में इस आत्मनिर्भरता का तात्पर्य यह है कि स्वयं पर निर्भर रहना यानि किसी
कार्य को स्वयं द्वारा कर पाने की क्षमता विकसित करना तभी राष्ट्र सबल बन पाएगा। भारतीय
परंपरा में प्रचलित कहावत भी है ‘अपना हाथ जगन्नाथ’ और ‘स्वयं अपने मरे ही स्वर्ग मिलता
है’। आत्मनिर्भर योजना 2020 की घोषणा पर माननीय प्रधानमंत्री महोदय जी ने कहा कि-
‘‘जिस प्रकार आजादी के आंदोलन की पीठिका भक्ति आंदोलन से शुरू हुई वैसे ही आत्मनिर्भर
भारत की पीठिका हमारे संत महंत आचार्य तैयार कर सकते हैं। हर व्यक्ति तक वह ‘वोकल फॉर
लोकल’ संदेश पहुंचना चाहिए इसलिए मैं सभी संतो महापुरुषों से विनम्र निवेदन करता हूंॅ
कि आइए हम इसके लिए आगे बढ़े1 इसका आशय यह है कि भारत को लोकल मैन्युफैक्चरिंग
सप्लाई चैन का महत्व समझना पड़ेगा और ऐसा करके अपने पैर मजबूत करने होंगे। लोकल यानी
स्वदेशी को बढ़ाना बड़ी जिम्मेदारी है इसलिए इस मंत्र को मानकर राष्ट्रजीवन सफल बनाना
होगा। एकात्म मानवदर्शन की विस्तृत व्याख्या करने वाले चिंतन दीनदयाल उपाध्याय जी सदैव
स्वदेशी को महत्व देकर उसको प्रसारित करने का आह्वान एकात्म मानव दर्शन द्वारा कर चुके
हैं जिसको आज समझने की आवश्यकता है। हाल ही में आत्मनिर्भर भारत योजना के अंतर्गत
20 लाख करोड़2 का विशेष आर्थिक पैकेज दिया गया जिसके चार स्तंभ हैं भूमि, श्रम, नकदी
और कानून। यह चारों स्तंभ आत्मनिर्भर भारत के स्वप्न को व्यवहारिक रूप प्रदान कर सकते
हैं। इसके अंतर्गत डैडम् लोन, किसान क्रेडिट कार्ड (ज्ञब्ब्), शिशु मुद्रा ऋण, क्रेडिट
लिंक्ड सब्सिडी (ब्स्ैै) आदि को जोड़ा गया है जो बहुत कारगर सिद्ध होगा। भूमि न होगी
तो श्रम कहाँ करेंगे और कानून उपयुक्त न होंगे तो नकदी कहाँ से मिलेगी और ऐसे ही समझें
तो श्रम न करेंगे तो भूमि का क्या प्रयोजन साथ ही नकदी नहीं तो कानून का क्या करेंगे?
हम इन चारों आवश्यक तत्वों की परस्पर पूरकता को बिना समझे आत्मनिर्भर भारत के स्वप्न
को पूरा नहीं कर सकते। यही एकात्म चिंतन की दृष्टि है। वसुधैव कुटुंबकम की संकल्पना
जिसे एकात्म मानव दर्शन ने आत्मसात किया उसको मानकर सब के साथ कदम ताल मिलाकर चल सकने
की क्षमता लानी होगी। जिस प्रकार मनुष्य के संपूर्ण व्यक्तित्व के विकास के लिए शरीर-
मन -बुद्धि- आत्मा का सामंजस्य होना चाहिए ठीक वैसे ही देश में सामाजिक आर्थिक क्षेत्र
में और वैश्विक पटल पर विश्व के प्रत्येक देश के साथ कदम ताल मिलाकर सामंजस्य बढाने
की आवश्यकता है। एमएसएमई लोन योजना को प्रोत्साहन तीन लाख करोड़ देकर नए व्यवसाय या
पहले से चले आ रहे को सुधारने की महत्वाकांक्षी योजना जिसमें धरी की धरी रह जाएगी अगर
ठीक से क्रियान्वयन न हुआ। ठीक से क्रियान्वयन न हो पाना ही दृष्टि के अभाव को द्योतक
है जिसको हमें संभालना होगा। एकात्म मानवदर्शन इस रूप मे मार्गदर्शन की बडी कसौटी है
जिसे स्वीकार करके ही भारत के राष्ट्रजीवन की धारा आगे बढेगी।
आत्मनिर्भर
होना आत्म केंद्रित होना नहीं है क्योकि आत्मकेन्द्रित होने से तो हम कट जाते हैं।
हम वैश्वीकरण की इस प्रक्रिया में स्वयं की क्षमताओं का इतना विकास करें कि किसी के
सामने झोली ना फैलाना पड़े और इसके लिए परस्पर पूरकता के सिद्धात का पालन करते हुए दूसरे
विकसित राष्ट्रों से सहायता लेकर भी रक्षा, उद्योग,स्वास्थ्य सेवाऐं, अंतरिक्ष प्रणाली,
संचार आदि क्षेत्रों मे प्रगति की जा सकती है। यह ठीक है कि भारत का संकल्प विश्व बंधुत्व
और भाईचारे में है इसलिए कोई सहायतार्थ हाथ बढ़ाएगा तो हम साथ ही देंगे। वैश्विक समन्वय
बनाते हुए भारत स्वयं की क्षमता बनाएगा और वस्तुओं की गुणवत्ता इतनी बेहतर करेगा कि
वैश्विक बाजार में भी प्रतिस्पर्धा कर सके। विश्व बैंक की डुइंग बिजनेस रिपोर्ट
2019 में जारी की गई। इस रिपोर्ट में भारत 190 देशों में 63वें स्थान पर रहा 2019 में
भारत का रैंक 77 था। भारत ने 10 संकेतकों में से 7 संकेतकों में अपनी रैंक में सुधार
की है और अंतरराष्ट्रीय श्रेष्ठ व्यवहारों के निकट आया है।3
प्रधानमंत्री
स्ट्रीट वेंडर्स आत्मनिर्भर निधि के अंतर्गत 5000 करोड स्पेशल क्रेडिट सुविधा 50 लाख
लाभान्वितों को प्रदान करना एक बहुत बड़ा कदम है।4 इन योजनाओं के क्रियान्वयन का लाभ
नवाचार न होंगे तो संभवतः उतना न मिलेगा इसलिए उद्धमिता विकास की बहुत आवश्यकता है।
अब स्टार्टअप इंडिया अभियान प्रारंभ किए जाने के साथ देश के 586 जिलों में मान्यता
प्राप्त स्टार्टअप पहुंच गये हैं। 29 राज्यों तथा केन्द्रशासित प्रदेशों में स्टार्टअप
नीतियां बन गई हैं। यह स्टार्टअप 4.2 लाख रोजगार सृजन कर रहे हैं।5 अब उधमियों के पास
अनेक कानूनों, नियमनों, वित्तीय तथा संरचना समर्थन के लाभ उठाने के विकल्प हैं। स्टार्टअप
इंडिया अभियान हमारी स्टार्टअप अर्थव्यवस्था के लिए चिन्ह्ति महत्वपूर्ण स्तंभों को
मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इस अर्थव्यवस्था को मजबूत कर उस दरिद्रनारायण
के हाथों को मजबूत भी करना होगा जिसकी कोई नहीं सुनता। जिसकी कोई न सुने उस दरिद्र
नारायण की भी चिंता करनी है यही एकात्म चिंतन है। उधोगों के विकसित होने से ग्राम पंचायतों,
जनपद पंचायत और नगर पालिकाओं की औधोगिक इकाइयों को भी बल मिलेगा जिसका प्रत्यक्ष सकारात्मक
प्रभाव ग्रामीण जनता के रोजगार पर पड़ेगा। इन लक्ष्यों की पूर्ति का उद्देश्य मात्र
कोविड 19 महामारी के दुष्परिणामों से लड़ना ही नहीं बल्कि अंतिम छोर के व्यक्ति की भी
चिंता कर भविष्य के भारत का निर्माण करना होना चाहिए। ऐसा भविष्य का भारत जो एकात्म
मानव दर्शन को मानते हुए संतुलन और परस्पर पूरकता के सिद्धांत का सम्मान करते हुए आगे
की ओर बढ़ता है। आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना का ठीक-ठीक विकास होगा तो यह पूंजीवाद
एवं समाजवाद की एकांकी सिद्धांत की अवहेलना कर समन्वयवाद को आत्मसात कर लेगी। गुलामी
की बेड़ियों से कई सो बर्षों तक जकड़े होने के कारण हम कदम न बढ़ा सके किंतु अब विश्वकल्याण
के मार्ग पर हमें अविलंब चलना होगा। भारत आत्मनिर्भर होगा तो वह स्वयं द्वारा तय किया
हुआ मार्ग प्रशस्त करेगा और शतत विकास को मानता रहेगा। बड़े-बड़े महलों इमारतों का स्वप्न
न देखकर भारत सुख शांति समृद्धि और मानवता के 4 स्तंभ- धर्म अर्थ काम मोक्ष को समझता
है और प्राथमिकता भी देता आया है और इसीलिए राष्ट्रजीवन की धारा को बिना बाधा के बहते
देखना चाह रहा है।
भारत
के ऐतिहासिक संदर्भ और स्वतंत्रता प्राप्ति काल के समय से ही स्वराज और स्वदेशी भारतीयों
के मन मस्तिष्क में रचे बसे हैं। हमारे देश में स्वदेशी वस्तुओं का इतना विकास हो जाए
कि हम आत्मनिर्भर होकर जीवन जी सकें और ‘‘लोकल फॉर वोकल विजन’’ को चरितार्थ कर सकें।
ध्यान रहे कि आत्मनिर्भरता ही स्वाभिमान की स्थिति को बनाए रखने का सहारा है इसलिए
चाहे वह मशीनरी सेक्टर हो चाहे प्रौधोगिकी का चाहे चिकित्सक की प्रणाली का चाहे कृषि
उद्योगों का इन सभी क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता ही हमें ‘‘सक्षम भारत’’ बनाएगी। पूंजीवादी
ताकतें जहां व्यक्ति को बाजारवाद, मशीनीकरण और घोर-उपभोक्तावाद की ओर धकेल रहे है वही
साम्यवादी दृष्टिकोण मानवीय स्वतंत्रता की समाप्ति कर हिंसा और संघर्ष के पथ की ओर
संकेत कर रहा है। ऐसे में इन दोनों अतिवादी सिद्धांतों के बीच भारत का मूल सांस्कृतिक
दृष्टिकोण एकात्म मानव दर्शन शांति एकीकरण और आत्मनिर्भरता के मंत्र को गुनगुना रहा
है। भारत मुसीबत के समय में भी दूसरे देशों की मदद करता है जैसा कि सुनामी के समय में
भारत स्वयं पीड़ित देश था फिर भी दूसरे देशो को मदद पहुॅचाना इसी मानसिकता का परिचायक
है। हमारी क्षमताएं अग्रणी देशों की तुलना में भले ही पीछे हों किंतु मदद के लिए हाथ
बढ़ाना हम नहीं भूल सकते क्योकि यही विपत्ति काल मे सहायता ही हमारी माटी का मूलमंत्र
है। भारत की क्षमता और प्रौधोगिकी सामर्थ्य को भले ही कई बार शंका से देखा गया और वैश्विक
स्तर पर हास्यास्पद स्थिति भी बनाई गई हो किंतु भारत ने आत्मनिर्भरता की सफलतम मिसाल
पेश की है। आज भारत में अत्याधुनिक तकनीकी प्रौधोगिकी चिकित्सकीय प्रणाली के साथ-साथ
विश्व में मानव संसाधन की कमी नहीं। आज नासा (यूएसए) जैसे अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त
एजेंसी के समकक्ष भारत की अंतरिक्ष प्रणाली को माना जा रहा है। आज भारत के पास अत्याधुनिक
रक्षा प्रणाली है जो रक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता सिद्ध करती है। यह आत्मनिर्भरता
ना होती तो हम अपने स्वाभिमान को भी ना बचा पाते। बिना किसी को भयभीत किए हुए सामर्थ्यवान
बनना ही भारतीय एकात्म मानव दर्शन है क्योकि वह परस्पर पूरकता के सिद्धात का पालन करता
है।
गरीबों,
श्रमिकों और किसानों को आत्मनिर्भर बनाएं बिना समृद्ध भारत का सपना नहीं देखा जा सकता
इसलिए आत्मनिर्भर भारत योजना का बड़ा हिस्सा ऋण के रूप में दिया गया है। सरकार बैंकों
को ऋण वापसी की गारंटी देगी। भारत की घरेलू मांग पर ही ध्यान दे दिया जाए तो हम पूर्ण
रूप से सक्षम हो जाएंगे। कृषि अधोसंरचना की मजबूती, पशुपालन सेटअप तैयार करना, खाद्यान्न,
कृषि विपणन सुधार, स्ट्रीट वेंडर्स को विशेष क्रेडिट के साथ-साथ फार्मा, स्टील, चिकित्सा
इलेक्ट्रॉनिक वस्तु वे क्षेत्र हैं जिनमें लगी मानव शक्ति को प्रोत्साहित किया जाएगा।6
आत्मनिर्भरता के लिए इन संसाधनों की आवश्यकता है साथ ही मानव समाज का ध्येय स्पष्ट
होना आवश्यक है। एकात्म मानव दर्शन मानता है कि सभी श्रमिक किसान मजदूर अगर ‘‘सहकार
की कार्य संस्कृति’’ अपनाएंगे तो बड़ी से बड़ी समस्या का हल वे स्वयं कर सकेंगे। वैसे
भी विश्व अब ग्वोवल विलेज है जहाँ कई आपदाऐं तो बिना भौगोलिक दीवारें देख कहीं भी पैर
पसार लेती हैं। सृष्टि मे सामंजस्य तत्व विविध रूप रखकर अपनी बात मनवा लेता है और जिसका
फल हम सभी को भोगना पडता है। एकात्म चिंतन यही कारण है कि प्रकृति के साथ छेड़छाड़ किए
बिना आर्थिक विकास और आत्मनिर्भरता को स्वीकार करता है। बिना आत्मविश्वास के स्वाबलंबी
समाज नहीं बन सकता इसलिए भारतीयों में पुनः आत्मविश्वास जगाने की आवश्यकता है। अगर
आपमें विश्वास ना हो तो कुत्ता भी भेड़िया और रस्सी भी साफ नजर आने लगता है। दीनदयाल
उपाध्याय जी ने इस बात पर जोर दिया कि ज्ञान किसी भी देश विदेश की बपौती नहीं उसका
प्रयोग देश अपनी परिस्थिति और आवश्यकतानुसार करता है। वे कहते हैं कि यंत्र मानव का
सहायक होना चाहिए प्रतिस्पर्धी नहीं किंतु पूंजीवादी शक्तियों के ने मशीनों को मानव
का प्रतिस्पर्धी बना दिया। अब मानव रोजगार को दर-दर भटके और मशीनें सारे काम करें तो
यह भारत में कम से कम उपयुक्त ना होगा।7
उपसंहार
उपर्युक्त वर्णित सामाग्री का अध्ययन करने से पता चलता है कि वस्तुतः एकात्म मानवदर्शन पर आधारित आत्मनिर्भरता ही भारत के राष्ट्रजीवन की धारा का मार्ग प्रशस्त करेगी। हमारी माटी का मूल दर्शन एकात्म मानव दर्शन संसाधनों के ठीक प्रबंधन पर बल देते हुए किसानों मजदूरों श्रमिकों के सामर्थ मनोबल को बढ़ाने का कार्य करता है। भारत के राष्ट्रजीवन में आत्मनिर्भर होने की अपार संभावनाएं हैं जिनको एकात्म के विराट चिंतन की दिव्यदृष्टि मिले तो अत्यंत गौरवशाली मार्ग होगा।
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